अंधविश्वास और आध्यात्म

                                                    श्री Vijay Batra जी (Founder of Shunya Panth) पिछले कई वर्षों से अंधविश्वास और रुढ़िवादी मान्यताओं को समाप्त करने के लिए अपने अद्वितीय गूढ़ज्ञान से भ्रमित और भयभीत लोगों का मार्गदर्शन कर रहे है | भारत और विदेशों में रहने वाले हजारों लोगों द्वारा इनके सटीक तर्कों और उद्धाहरणों की सराहना की गयी है | इन्होने आध्यात्म और कर्मफल के रहस्यमयी ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने के लक्ष्य से शून्यसंहिता की रचना भी की है जिसमे सभी आध्यात्मिक प्रश्नों के तार्किक उत्तर लिखे है जो व्यक्ति का अंधविश्वास समाप्त करके निडर और सकारात्मक होने में सहायता करते है | इनका कहना है कि धर्म,आध्यात्म नहीं है और हर धार्मिक व्यक्ति को आध्यात्मिक होने की आवश्यकता है इसीलिए ये धर्मरहित आध्यात्म का प्रचार कर रहे है | आप भी इनके गूढ़ आध्यात्मिक ज्ञान का लाभ उठाये |

 

श्री बतरा जी अपने तार्किक ज्ञान से भिन्न-भिन्न विज्ञानों को समझाते है इनमे सबसे पहला ज्योतिष विज्ञान है | जब व्यक्ति के कार्य उसकी इच्छा के अनुसार नहीं होते या उसे भविष्य की अकारण चिंता होती है तब वह ज्योतिष विज्ञान पर निर्भर हो जाता है | ज्योतिष एक महान विज्ञान है जिसमे ग्रहों की स्थिति द्वारा व्यक्ति की मानसिक और आर्थिक स्थिति को पढ़ा जा सकता है | व्यक्ति के पास धन ना होने के बावजूद ज्योतिषी द्वारा किसी समस्या के लिए बताये गए उपायों पर वह लाखों रूपए का खर्चा करने को भी तैयार हो जाता है क्योंकि ज्योतिषी ने यह कहा होता है कि ऐसा करने से उसका भाग्य बदल जायेगा, सुख समृद्धि आएगी और सभी समस्याएं समाप्त हो जाएँगी | प्रतिदिन ऐसे अनेकों लोग श्री बतरा जी के पास मार्गदर्शन के लिए आते है जिन्हें सभी प्रकार के उपायों को करने के बाद भी कोई लाभ नहीं मिला और वह स्वयं को ठगा हुआ अनुभव करते है |

 

इस बात से भी आप सहमत होंगे कि व्यक्ति को अपने पिछले कर्मों के अनुसार ही सब कुछ मिलता है परन्तु इन पिछले कर्मों को इस जन्म में बदला नहीं जा सकता | यदि आप चालीस वर्ष की आयु में अपनी जन्मकुंडली को देखते हैं या किसी ज्योतिषी को दिखाते है तब भी ग्रहों की स्थिति वही होगी जो जन्म के समय पर थी । जिस भाव में जो ग्रह स्थित है वह जीवनकाल में कभी भी देखने पर वैसे ही स्थित रहता है जैसे वह जन्म के समय पर था और उसका अपना मूल प्रभाव वैसा ही रहता है जो ज्योतिष विज्ञान में बताया भी जाता है | श्री बतरा जी द्वारा बात स्पष्ट है कि संसार में ऐसा कोई भी ज्ञानी या विद्वान नहीं है जो उनमे से किसी ग्रह को उठा कर किसी दूसरे भाव में रख दे । जैसे एक सेकेण्ड पहले बोली गयी बात को वापिस मुख के अंदर नहीं लिया जा सकता, वैसे ही किसी उपाय द्वारा पिछले जन्मो में किये कर्मो को या उनके फल को बदला नहीं जा सकता | भाग्य बदलने के नाम पर किए और करवाए गए आज के सभी कर्मों का फल पिछले कर्मों के फल के साथ व्यक्ति को ही भुगतने है |

 

आज को बदलने के लिए बीते हुए कल को बदलने का प्रयास करने वाला व्यक्ति मूर्ख और भ्रमित कहलाता है । जब से ज्योतिष का मीडिया के माध्यम से व्यवसायीकरण हुआ है तब से प्रत्येक ज्योतिषी अधिक से अधिक उपायों और प्रयोगों को बताकर भोले-भाले लोगों को प्रतिदिन किसी उपाय पर निर्भर होने की आदत डाल रहा है | आध्यात्म नियम के अनुसार आत्मा को अपने पिछले किए सभी कर्मों का फल भोगकर ही समाप्त करना होता है | जो लोग प्रतिदिन किसी उपाय की खोज में रहते है कि आज क्या किया जाये कि दिन अच्छा बीते, ऐसे लोग अपने दिमाग या अपनी योग्यता का पूरा लाभ नहीं उठा पाते क्योंकि उनका अधिकतर समय टीवी पर देखे उपायों के बारे में सोचने में ही व्यतीत हो जाता है |

 

व्यक्ति को अधिक भयभीत करने के लिए शनि और पितृदोष जैसे शब्दों का जमकर प्रयोग होता है परन्तु यदि इसे तर्क के आधार पर समझा जाये तो अपनेआप यह ज्ञान हो जाता है कि इन शब्दों का प्रयोग केवल मूर्ख बनाने के लिए किया जाता है | शनि का नाम सुनते ही सभी डरने लगते है कि ना जाने अब कौन सी समस्या का सामना करना पड़ेगा | आइये समझने का प्रयत्न करते है कि शनि ऐसा क्या करता है जिससे हमें डर लगता है और हम उस डर से किस प्रकार से  बच सकते है |  यदि हम वैज्ञानिक दृष्टि से शनि तथा उसके प्रभाव को समझने का प्रयास करे तो शंका और डर को समाप्त किया जा सकता है | हम सभी जानते है कि सूर्य के चारो तरफ सभी ग्रह चक्कर लगाते हैं जैसे पृथ्वी एक वर्ष में अपना चक्कर पूरा करती है और पृथ्वी पर  सूर्य की रौशनी और गर्मी पहुँचती है | शनि तीस वर्षो में सूर्य के चारों ओर अपना चक्कर पूरा करता है और सौरमंडल में शनि सूर्य से सबसे दूर का ग्रह है इसलिए शनि पर सूर्य की रौशनी/प्रकाश तथा ऊष्मा/गर्मी बिलकुल भी नहीं पहुँचती इसलिए शनि पर अँधेरा और बर्फ है |  सभी ग्रह अपनी गति, आकार तथा स्वभाव के हिसाब से ही पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीवो को प्रभावित करते है | इसका सीधा यह अर्थ हुआ कि शनि धीमा करने वाला , ठंडा करने वाला तथा उस पर अँधेरा होने के कारण नकारात्मक करने की क्षमता रखने वाला ग्रह है | जब हमें ठण्ड लगती है तो हम गरम कपडे पहनते हैं और जब हम अँधेरे में होते है तो हम प्रकाश(Light) का प्रयोग करते है | जब हम कही जल्दी पहुंचना चाहते है तो किसी तेज़ सवारी का प्रयोग करते है ठीक उसी प्रकार यह समझने कि आवश्यकता है कि आज शनि हमें किस प्रकार से प्रभावित कर रहा है और हमें क्या करना चाहिए | यदि इस तर्क को समझ लिया तो शनि की सूक्ष्म किरणे कभी भी नकारात्मक प्रभाव नहीं कर सकती |

 

शनि ग्रह है या देवता :- संसार में शनि की क्रूर दृष्टि से डरने वालों की कमी नहीं है, इसी डर के कारण पूजा अर्चना करके शनि को प्रसन्न करने की कोशिश भी की जाती है | विचार करने वाली बात यह है कि शनि ग्रह है या देवता ! यदि शनि अन्य देवी देवताओं की तरह देवता है तो धार्मिक लोगों द्वारा शनि-देव की पूजा होनी ही चाहिए परन्तु ऐसा भी कहा जाता है कि देवी-देवता किसी का अनिष्ट नहीं करते इसलिए शनि-देव से डर भी नहीं होना चाहिए,  यदि शनिदेव से कोई मनुष्य डरता है तो यह उसकी मूर्खता ही कहलाएगी | ऐसा भी सभी मानते हैं कि शनिदेव, सूर्यदेव के पुत्र है और वे सारे संसार के न्यायधीश है |

अब प्रश्न यह है कि सूर्यपुत्र शनि-देव के जन्म से पहले, और शनिदेव को न्यायभार मिलने तक संसार में कोई न्याय नहीं होता था, यदि होता था तो वो कौन करता था ! शनि-देव के जन्म से पहले और जिस समयकाल को सतयुग कहते है जिसमे देवी-देवताओं का जन्म हुआ उस समय में शनि-ग्रह (जो सूर्य के चारो ओर चक्कर लगाता है) नहीं था, और यदि था तो उसका नाम शनिग्रह कैसे था ?

 

           दूसरी ओर शनिग्रह की धीमी गति, शनिग्रह की तिरछी दृष्टि और शनिग्रह द्वारा मिलने वाली समस्याएं और विपदाओं का वर्णन होता है जिसके कारण शनिग्रह को मानने वाले सभी लोग डरते भी है | यदि निष्पक्ष और निडर होकर विचार करे तो संसार की उत्पत्ति और मनुष्य जन्म के समय सभी ग्रह आकाश में थे जिनके प्रभाव से ही संसार सुचारू रूप से चल रहा है | जब सूर्यपुत्र शनिदेव का जन्म हुआ होगा तब भी शनिग्रह आकाश में गतिमान था, ऐसा नहीं हो सकता कि किसी वरदान के कारण रातोंरात किसी ग्रह की उत्पत्ति हो गयी हो और वह सूर्य के चारों ओर चक्कर भी लगाना आरम्भ कर दे | आज तक की प्रचलित कथाओं और कहानियों में सूर्य और शनि दोनों की आपस में कभी नहीं बनी, इन्ही कहानियों के आधार पर इस बात को सभी मानते भी है | विचारणीय बात यह भी है कि जब शनि की सूर्य से बनती ही नहीं, दोनों की आपस में घनी शत्रुता है तो शनि अपने शत्रु के चारों ओर चक्कर क्यों लगा रहा है ! अज्ञानता और सुनी सुनाई बातें धार्मिक व्यक्ति को बहुत अधिक भ्रमित और भयभीत करने का कार्य करती है |

 

शनिदेव न्याय के देवता है यह बात शनि में विश्वास रखने वाले अधिकतर लोग मानते है | एक सत्य यह भी है कि न्यायाधीश अपना निर्णय या न्याय बताने के लिए किसी के पीछे या उसके घर नहीं जाते उसके लिए न्यायालय के चक्कर लगाने पड़ते है | यदि किसी व्यक्ति को ऐसा लगता है कि उसके जीवन में हो रही घटनाएं उसके स्वयं के कर्मफल के अनुसार नहीं हो रही है  तो वह शनिदेव के पास जाकर न्याय की गुहार कर सकता है | इस गुहार के न्याय में शनिदेव उसे आत्मज्ञान देते है जिससे व्यक्ति को अपनेआप यह ज्ञान होने लगता है कि उसे, उसके किस कर्म का फल मिल रहा है | यह ज्ञान इसी जन्म में होगा या अगले किसी जन्म में होगा यह भी निश्चित नहीं है क्योंकि शनिदेव (न्यायाधीश) दूसरों के कहे पर नहीं अपनी इच्छा से कार्य करते है | अब यह व्यक्ति के अपने वर्तमान कर्मों के आधार पर ही निर्भर होता है कि उसे आत्मज्ञान कब और कैसे होता है |

 

                                     शनिग्रह, अन्य ग्रहों की भांति आकाश में स्थित है जो सूर्य के चारों और चक्कर लगाता है और इसकी सूक्ष्म किरणें भी अन्य ग्रहों के ही भांति ही अन्य सभी ग्रहों पर पड़ती है जिसमे पृथ्वी भी है | शनिदेव सूर्यदेव के पुत्र हैं जिनका कार्य आवश्यकता पड़ने पर न्याय करना है | अज्ञानता और दुष्प्रचार के चलते सभी लोग शनिदेव और शनिग्रह दोनों को एक समझते है जो तर्कहीन है | शनिदेव को शरीर छोड़े लाखो वर्ष हो चुके है जबकि शनिग्रह करोडो सालो से आकाश में गतिमान है और जिसकी सूक्ष्म किरणें हर युग के हर जीव पर पड़ती है, अनेकों कहानियों में ऐसा भी कहा गया है कि शनि से देवी-देवता भी नहीं बच पाए थे | श्री बतरा जी इस बात को भी स्पष्ट करते है कि देवी-देवता शनिग्रह की शूक्ष्म किरणों से नहीं बच पाए थे क्योंकि उस समय शनिग्रह आकाश में उपस्थित था | यह बात समझने वाली है कि यदि देवी-देवता किसी का अनिष्ट नहीं करते तो शनिदेव भी अनिष्ट नहीं कर सकते | एक और बात विचार करने योग्य है कि किसी देवता की पूजा अर्चना करने से देवता अवश्य प्रसन्न होते होंगे परन्तु वह भी किसी पापकर्म के फल को समाप्त नहीं कर सकते क्योंकि शनिग्रह की सूक्ष्म किरणों से देवी देवता भी नहीं बचे थे | शनिग्रह की सूक्ष्म किरणों के आधार पर ही सूर्यपुत्र शनिदेव का भी स्वभाव, रंग रूप और जीवन वैसा था |  जो शनिदेव स्वयं शनिग्रह की सूक्ष्म किरणों से नहीं बचे थे वह किसी भी जीव को शनिग्रह से कैसे बचा सकते है |

श्री Vijay Batra जी ऐसा नहीं कहते कि शनिदेव की पूजा-अर्चना छोड़ दो या शनिग्रह की पूजा आरंभ कर दो, उनका मानना और कहना यह है कि ग्रहों की पूजा करने से व्यक्ति को केवल मानसिक संतोष मिलता है कि अब ग्रहों से उसे कोई हानि नहीं है जबकि ग्रह कभी भी शांत या अशांत नहीं होते, आकाश में ग्रहों की गति सदैव एक जैसी ही रहती है | कोई व्यक्ति पूजा करे या नहीं करे देवी देवताओं या ग्रहों को कोई लेना देना नहीं है ना ही वे पूजा नहीं करने वालों से प्रसन्न या अप्रसन्न होते है यदि ऐसा होता तो संसार की आबादी में पूजा करने वालों से अधिक संख्या पूजा नहीं करने वालों की है | यह जीवों के स्वयं के कर्मों का फल है कि उन्हें अपना जीवन अंधविश्वासों और निराधार मान्यताओं में व्यतीत करना पड़ता है |

 

यह बात सभी को समझनी चाहिए कि संसार में कुछ प्राकृतिक नियम है जिसमे हर कर्म का एक निश्चित फल है जो देवी-देवता और सभी जीवों पर बराबर लागू होता है | पूजा अर्चना, दान पुण्य, इत्यादि सांसारिक सुखों एवं स्वार्थ के लिए किए जाते है, आत्मिक सुख का किसी भी कर्म या उसके फल से कोई लेना देना नहीं है | पूजा-अर्चना इत्यादि करना अपने मन को व्यस्त रखने और समय व्यतीत करने का एक अच्छा साधन है | शनिदेव या शनिग्रह से डरने या उनकी पूजा करने से पहले व्यक्ति को यह ज्ञान होना चाहिए कि वह न्याय की गुहार कर रहा है या अकारण डर रहा है | सत्य यह है कि व्यक्ति कितनी भी गुहार लगाये या भयभीत हो कर्मफल से कभी नहीं बच सकता | अपने समय, धन और ऊर्जा को अंधविश्वासों और मान्यताओं में नष्ट करने से अच्छा है कि उनका सदुपयोग आत्मज्ञान के लिए किया जाये |

 

श्री Vijay Batra जी के तार्किक एवं आध्यात्मिक ज्ञान से अब पित्रदोष को भी समझ लेते है कि आखिर पित्रदोष किस समस्या का नाम है | यह वास्तव में यह कोई गंभीर समस्या है या इसे भी किसी निजी लाभ के लिए फैलाया हुआ भ्रम है ! समस्याओं के लिए अनेकों उपायों को करने के बाद भी जब व्यक्ति को कोई लाभ नहीं मिलता तब उसे पित्रदोष बताया जाता है | सभी ने पित्रदोष के बारे में पढ़ा-सुना है कि जिस व्यक्ति की कुंडली में पित्रदोष हो उसे जीवन में अनेक प्रकार की समस्याओं और बाधाओं का सामना करना पड़ता है | पित्रदोष का अर्थ यह बताया जाता है कि किसी व्यक्ति के पूर्वजो का उससे रुष्ट (नाराज़) हो जाना, इसीलिए व्यक्ति पूर्वजो को मानने का हर संभव प्रयास करता है | पित्र कैसे प्रसन्न होंगे इसका मूल ज्ञान ना होने के कारण व्यक्ति को जो भी उपाय बताये जाते हैं वह उन उपायों को ह्रदय से करता है कि किसी भी प्रकार से पित्र प्रसन्न हो जाये और जीवन की सभी समस्याएं समाप्त हो |  प्रश्न यह है कि पित्र रुष्ट क्यों होते है, जिसके लिए व्यक्ति हर संभव और असंभव प्रयास करने के लिए विवश हो जाता है | कुछ लोगो ने अपने दादा को देखा होगा और ऐसे लोग बहुत ही कम होंगे जिन्होंने अपने पडदादा (दादा के पिता) को देखा होगा | आप सहमत होंगे कि पित्रों का अर्थ दादा,  पडदादा,  पडदादा के पिता या फिर उनके भी दादा पडदादा है | कोई भी माता पिता अपनी संतान का बुरा नहीं सोचेंगे या करेंगे, और ना ही उनका बुरा होते देख सकते है वो सदा चाहेंगे कि उनकी संतान सुखी और समृद्ध रहे |

  • जिन पितरों ने हमें देखा नहीं या हमारा उनसे कोई लेना-देना नहीं रहा वो हमसे रुष्ट कैसे होंगे ? 
  • उन्हें क्या पता कि उनकी तीसरी-चौथी या अगली किसी पीढ़ी में हम जन्म लेंगे ?  
  • जिन बड़े बुज़ुर्ग से हमारी कभी बात नहीं हुई वो आशीर्वाद देने के बजाय रुष्ट क्यों होंगे या श्राप क्यों देंगे ? 
  • परिवार में कोई जातक जन्म ले तो दादा या पडदादा प्रसन्न होने के बजाय उससे रुष्ट क्यों होगा चाहे वो कैसा भी हो ? 
  • जब हमारा जन्म हुआ तब यदि पित्र किसी अन्य योनी(शरीर) में जन्म ले चुके होंगे तो उनके लिए किये गए उपाय आदि का उन्हें पता कैसे लगेगा कि वह प्रसन्न हों ?

सभी को पता है कि हर व्यक्ति अपने-अपने कर्म भोगने संसार में जन्म लेता है यहाँ जो भी हो रहा है वह अपने ही द्वारा किए कर्मो का फल है जिसे भाग्य कहा जाता है | 

यदि सभी अपने अपने कर्मो के अनुसार सुख-दुःख, समस्याओं या बाधाओं का सामना करते हैं तो पित्रदोष क्या है ? 

  • क्या भोले भाले लोगो को अपने निजी लाभ के लिए डराया जाता है ?  
  • क्या लाखो रूपए खर्च करके किए गए पित्रदोष के उपाय केवल निजी लाभ के लिए हैं?
  • जिन लोगों को जन्मकुंडली में विशवास नहीं है क्या उनके पित्र उनसे रुष्ट नहीं होते, यदि होते है तो क्या वह प्रसन्न नहीं होते क्योंकि उपाय तो किए ही नहीं जाते ?

ऐसी बहुत सी बातें विचार करने योग्य है कि व्यक्ति को जो बताया गया है वह कितना न्यायसंगत है और कितना डराने के लिए है | जातक के जन्म के समय आकाश के ग्रहों की स्थिति को जन्मकुंडली कहते है जन्मकुंडली मे बारह भाव और नौ ग्रहों की गणना की जाती है | स्वाभाविक सी बात है कि इन बारह भावों में नौ ग्रह किसी ना किसी भाव में ही स्थित होंगे | भृगु ऋषि जी ने इन ग्रहों की स्थिति द्वारा ऐसी गणना बनायीं थी जिससे यह पता लगाया जा सकता है कि जातक के पिछले कर्मो के फल का उस पर क्या प्रभाव है और भविष्य के लिए वर्तमान ग्रह स्थिति के अनुसार वह किस प्रकार के कर्म कर सकता है |  पित्रदोष जैसे अनेको ऐसे शब्द है जो केवल डराने और निजी लाभ के लिए बनाये गए है | अब आप स्वयं ही यह निश्चित कीजिये कि किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में पित्रदोष हो सकता है या नहीं !

 

मंत्रो के लाभ-हानि !

संसार का प्रत्येक धार्मिक व्यक्ति किसी ना किसी मंत्र का उच्चारण अवश्य करता है |  ऐसा प्रचलित है कि प्रत्येक मंत्र उच्चारण का अपना एक प्रभाव होता है जिससे वायुमंडल में सकारात्मक मंत्रशक्ति सक्रिय हो जाती है जिससे इच्छित फल की प्राप्ति होती है | ऐसी धारणा है कि सही उच्चारण से मंत्र का नकारात्मक प्रभाव कभी नही होता परन्तु यह पूर्ण सत्य नहीं है | जब व्यक्ति समस्याओं से घिरा होता है तो वह जगह-जगह जाकर उपाय और समाधान पूछता है जिसके लिए उसे कोई मंत्र भी दिया जाता है कि इसका जाप करने से समस्याओं का अंत होगा और जीवन में सुख-समृद्धि आएगी | मंत्रशक्ति के सक्रियता के कारण मंत्र का उच्चारण करने वाले अधिकतर लोग स्वयं और आसपास के माहौल में सकारात्मकता का अनुभव भी करते है | व्यक्ति द्वारा मंत्रों से स्वयं उत्पन्न की गयी मंत्रशक्ति में सकारात्मक प्रभाव के साथ-साथ मंत्र का नकारात्मक प्रभाव भी होता है परन्तु साधारण व्यक्ति को मंत्रों की नकारात्मकता के बारे में ज्ञान नहीं है | संसार के कुछ ही लोगों को यह ज्ञान है कि मंत्रो का नकारात्मक प्रभाव भी होता है |  मंत्रों के अधिक उच्चारण से व्यक्ति की समस्या समाप्त होने के स्थान पर एक और नयी समस्या उत्पन्न हो जाती है |

 

मंत्रों का उच्चारण लाखों वर्षों से हो रहा है फिर भी पुराने समय की तुलना में आज के समय में व्यक्ति की समस्याएं और दुविधाएं पहले से कई गुना अधिक है | यदि मंत्रों का केवल सकारात्मक प्रभाव ही होता तो बीते लाखों वर्षों में मनुष्यों द्वारा किए गए मंत्रो के उच्चारण से वायुमंडल में मंत्रशक्ति इतनी सक्रीय होती कि संसार के किसी व्यक्ति को कोई समस्या ही नहीं होती | किसी मंत्र द्वारा किसी वस्तु को प्राप्त करने के साथ-साथ किसी दूसरी प्राप्त वस्तु की हानि होना निश्चित है | एक वस्तु को पाने के लिए उच्चारण किया गया मंत्र दूसरी वस्तु का अंत करता है क्योंकि मंत्रशक्ति सकारात्मक भी है और नकारात्मक भी है | किसी भी मंत्र का उच्चारण करने से पहले व्यक्ति को किसी सांसारिक सुख की हानि सहने के लिए तैयार रहना चाहिए | किसी जीवित या मृत व्यक्ति का नाम बार-बार लेने से भी एक प्रकार की ऊर्जा उत्पन्न होती है जिससे लाभ और हानि दोनों होते है | जिस व्यक्ति का नाम लिया गया है उसके विचार,  गुण-अवगुण, रहन-सहन और उस पर सांसारिक प्रभाव, उसका नाम लेने वाले पर भी होता है | सांसारिक सुखों की प्राप्ति के लिए ऐसे व्यक्ति के नाम का उच्चारण नहीं करना चाहिए जिसका स्वयं का जीवन संघर्षमयी हो |

सूर्य की ऊर्जा पृथ्वी के वातावरण के कारण लाभकारी है परन्तु इसकी ऊर्जा की अधिकता में सभी कुछ भस्म करने की क्षमता भी है, इसी प्रकार मंत्र उच्चारण की अधिकता में सांसारिक सुखों की हानि करने की क्षमता है | जिस मंत्र के उच्चारण में लाभ का स्वार्थ होगा उसमे हानि अवश्य होगी | प्रत्येक लाभ में हानि है और प्रत्येक हानि में लाभ है | मंत्रों के नकारात्मक प्रभाव को तर्क सहित केवल श्री Vijay Batra जी ने ही समझाया है अभी तक यह माना जाता रहा है कि मंत्र केवल सकारात्मक होते है |

 

देवी-देवता या भ्रम !

यह प्रश्न लाखों लोगों के मन में भी होगा कि हमारा देवी-देवता कौन सा है यानी हमें किस देवी या देवता की पूजा करनी चाहिए, अभी जिस देवी-देवता की पूजा कर रहे है उसमे कोई गलती तो नहीं हो रही है ? 

जन्मकुंडली देखकर ज्योतिषियों द्वारा देवी या देवता बताया जाता है कि केवल इसी देवी-देवता की पूजा आराधना से सारे सांसारिक कष्ट समाप्त होंगे और मोक्ष भी मिलेगा, यदि ऐसा नहीं किया गया तो देवी-देवता रुष्ट हो जायेगें | श्री बतरा जी कहते है कि यह बहुत दुःख वाली बात है कि दुखी और भटके लोगों का मार्गदर्शन करने वालों ने भोले-भाले लोगों को इतना अधिक भ्रमित कर दिया है कि वे लोग देवी-देवता की पूजा अर्चना भी करते रहते है और पाप-पुण्य के भय तथा सही-गलत के भ्रम में अपनेआप को बिना कारण पापी भी मानने रहते है |

गुरु, ज्ञान और धर्म, इन तीनो का कार्य भय तथा भ्रम को समाप्त करना है, इनका प्रयोग साधारण व्यक्ति को भ्रमित और भयभीत करने के लिए नहीं होना चाहिए | श्री बतरा जी की आध्यात्मिक दृष्टि से इस बात को समझते है कि किसी व्यक्ति का देवी या देवता कौन सा होना चाहिए !

श्री Vijay Batra जी का कहना है कि संसार में करोड़ों ऐसे लोग है जो देवी-देवताओं को नहीं मानते, परन्तु उन पर भी आकाश में स्थित ग्रहों का उतना ही प्रभाव होता है जितना देवी-देवता को मानने वालों पर होता है, क्योंकि सूर्य यह सोच कर नहीं दिखता कि कौन मेरी पूजा करता है, केवल उसके घर में रौशनी हो जो पूजा करता है और दूसरों के घर पर अँधेरा हो | जो लोग धर्म में विश्वास नहीं रखते उन लोगों का भी पिछले जन्मों का कर्मफल होता है तभी उन्हें मनुष्य जन्म मिला है, यह दूसरी बात है कि वो लोग इसको किसी विज्ञान द्वारा नहीं पढ़ते |

किसी भी देवी-देवता की पूजा करने से उसका फल उल्टा कैसे मिलेगा यदि व्यक्ति की श्रद्धा और उसका विश्वास सच्चा है | व्यक्ति के स्वयं की श्रद्धा और विश्वास अडिग हो तो पत्थर में से भी मनचाहा देवता मिल जाता है | देवी-देवता बताने वालों की गणना के अनुसार ऐसे लोगों का जीवन  कभी भी सरल नहीं होगा जो लोग ईश्वर में तो विश्वास रखते है परन्तु देवी-देवता को नहीं मानते | ऐसे लोगों के बारे में वे क्या कहेंगे जिनके लिए गुरु ही सर्वत्र है क्योंकि गुरु को देवी-देवताओं से भी ऊपर कहा और माना गया है | देवी-देवता निर्धारित करने वालों को इस बात का ज्ञान कैसे होता है कि पिछले जन्म में व्यक्ति इसी धर्म में था, इस बात को बताने वाले ने अपनी कौन सी चौथी दृष्टि का प्रयोग किया यह भी अपने आप में दिलचस्प बात है |

एक और विचारणीय बात है कि यदि व्यक्ति पिछले जन्म में दूसरे धर्म या देवी-देवता को मान रहा था और इस जन्म में किसी अन्य देवता की पूजा-आराधना करने के लिए बता दिया तो किसी अन्य देवी-देवता की पूजा इत्यादि बताने वाले व्यक्ति ने दूसरों को भ्रमित करने का पाप करके स्वयं के लिए ही नरक निश्चित कर लिया है |

ईश्वर एक है और निरकार है, देवी-देवता ईश्वर के मंत्री है जिनके पास अपना-अपना विभाग है, व्यक्ति अपनी सांसारिक इच्छा और आवश्यकता के अनुसार किसी भी विभाग में जाकर मंत्री से मिल सकता है | जो लोग देवी-देवताओं को नहीं मानते उनके कार्य भी वैसे ही होते है जैसे देवी-देवताओं को मानने वालों के होते है | ज्योतिषियों द्वारा आपका देवी-देवता बताकर भ्रमित किया जाता है या सही मार्गदर्शन किया जाता है अब यह आप स्वयं ही तय कर सकते है |

साधारण व्यक्ति में आध्यात्मिक शिक्षा का अभाव देवी-देवता के नाम पर मूर्ख बनाने वालों के लिए सफलता की कुंजी है | व्यक्ति को इतनी आध्यात्मिक शिक्षा अवश्य होनी चाहिए जिससे वह अपना जीवन सकारात्मक और निडर होकर जी सके | अपने आप को गुरु या ज्ञानी कहने वाले लोगों को श्री बतरा जी एक बात कहते हैं कि दूसरों को परामर्श देने से पहले अपनी बात का तर्क अवश्य सोचना चाहिए ! 

जब व्यक्ति ज्योतिषियों से निराश हो जाता है तब वह किसी अन्य उपाय की खोज करता है इसी खोज में वह वास्तु की शरण में जाता है | किसी भी व्यक्ति का भाग्य बदलने के लिए वास्तुकार उसके घर का वास्तु पूर्व दिशा को ध्यान में रखकर ठीक करता है | पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है यह हम सभी जानते है, अब विचार करने वाली बात यह है कि पृथ्वी के घूमने पर जब भवन की दिशा बदलेगी तब भवन को भी अवश्य घुमाना चाहिए नहीं तो वास्तुकार द्वारा पूर्व दिशा के अनुसार बताया गया वास्तु उपाय कैसे कार्य करेगा !

हम सभी जानते है कि वास्तु एक विज्ञान है और इसकी सहायता से किसी भी स्थान के वास्तु दोष को समाप्त करके भाग्य बदलने या समस्याओं को समाप्त करने का दावा किया जाता है | ऐसा माना जाता है कि जिस स्थान पर वास्तु दोष हो वहां अनेको प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है | वास्तु के बारे में जानने के लिए अनेको लेखको द्वारा लिखी गयी पुस्तकों  की मदद ली जाती है या जब जीवन में समस्या आने लगती है तो किसी वास्तु विशेषज्ञ से मदद ली जाती है | किसी भी स्थान के वास्तु को ठीक करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात है कि भूखंड  का आकार आयताकार या वर्गाकार होना चाहिए | वास्तु में पूर्व और उत्तर दिशा का भी ख़ास महत्त्व है, किसी भी वास्तुदोष को ठीक करने में इन दिशाओं का बहुत ध्यान रखा जाता है | किसी भी वास्तु प्रेमी को इन बातो का ज्ञान होता है क्योंकि यह मूल ज्ञान है |

श्री बतरा जी यह कहते है कि इस संसार का निर्माण करते समय प्रकृति ने भी वास्तु के अनुसार ही इस ब्रह्माण्ड की रचना की होगी | यदि हम किसी भी प्राकृतिक वस्तु को देखे तो वह गोल है जैसे सभी ग्रह, पेड़, पहाड़, मानव अंग, इत्यादि | इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि प्रकृति गोल आकार में विश्वास रखती है और हम आयताकार और वर्गाकार में विश्वास रखते है | यह भी हो सकता है मनुष्य ने अपनी सुविधा के लिए ऐसे विज्ञान  का निर्माण किया हो परन्तु यदि हम प्रकृति से सीखें तो भूखंड का आकार गोल ही उत्तम होना चाहिए | 

एक अन्य बात जो विचार करने योग्य है कि किसी भूखंड की दिशा पूर्व है तो चौबीस घंटे पूर्व दिशा से सकारात्मक ऊर्जा कैसे आ सकती है क्योंकि यदि सुबह छह बजे सूर्योदय होता है तो शाम को छह बजे उस भूखंड की दिशा पश्चिम दिशा में होगी क्योकि पृथ्वी घूमती है दिन के बारह बजे और रात के बारह बजे उसी भूखंड की दिशा उत्तर और दक्षिण भी होती है | इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि कोई भी भूखंड किसी भी दिशा में हो उस पर प्रकृति चारो दिशाओं से सभी ग्रहों की किरणों को सामान रूप से पहुंचाती है | जिनका घर या दफ्तर सुबह छह बजे पूर्व दिशा में है उन पर सूर्य की किरणे पहले पड़ती है जिनका सुबह छह बजे पश्चिम दिशा में है उन पर बाद में पड़ती है |

श्री बतरा जी एक बात कहते हैं कि जीव पर पृथ्वी का अपना भी बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है | भाग्य , कर्म और परिणाम में पृथ्वी (स्थान) विशेष भूमिका निभाती है | जो लोग अपार्टमेन्ट में रहते है उनमे से कुछ ही लोग वास्तु को ठीक करवाते है सभी नहीं |

  • प्रश्न यह है कि समान आकार के घरो और दिशा में रहने वालो पर अलग अलग प्रभाव क्यों ?
  • किसी समस्या के समय ही वास्तु क्यों खराब होता है पहले क्यों नहीं ?

जबकि घर में रहते हुए सालो हो जाते है | श्री बतरा जी का निजी रूप से मानना है कि जीव पर सबसे अधिक  प्रभाव अपने किये कर्मो का होता है यदि कर्म ठीक है तो सभी कुछ ठीक है | सभी विज्ञान अपने आप में भिन्न है और इनको विकसित करने के पीछे कोई न कोई तर्क अवश्य ही होता है परन्तु उन तर्कों को तोड़ मरोड़ के प्रस्तुत करने से विज्ञान की अपनी गरिमा धूमिल हो जाती है | जो भी कार्य हो वो एक सीमा और मर्यादा तक ही हो तो अच्छा लगता है आवश्यकता से अधिक कोई भी कार्य हानि करता है |

वास्तु ऐसा विज्ञान है जो केवल पूँजीपतियों के लिए है जो उन्हें मानसिक संतुष्टि देता है कि वास्तु पर धन खर्च करके भाग्य बदलेगा | आध्यात्म में दिशाओं का कोई महत्त्व नहीं है,  आत्मा किसी भी दिशा में हो उसे कर्मफल भोगना ही पड़ता है | भाग्य का संबंध किसी साकार वस्तु से नहीं है यह बात का ज्ञान होने पर ही व्यक्ति का अंधविश्वास और भ्रम समाप्त हो सकता है | वास्तु से निराश लोग अपने नाम में बदलाव करने लगते है जिससे उनके नाम की संख्या बदल जाये और उनका भाग्य उनका साथ देने लग जाए | कर्मफल आत्मा को मिलना है किसी नाम को नहीं यदि नाम से कर्मफल बनता तो सभी राम नाम के लोगों को बनवास होता | नाम और संख्या मनुष्य द्वारा अपनी सुविधा के लिए बनायीं गयी है, आध्यात्म का नाम या संख्या से कोई लेना देना नहीं है, आध्यात्म का संबंध केवल आत्मा से है | इसी प्रकार कुछ लोगों को दिनवार के अनुसार कपड़ो का रंग मानसिक संतुष्टि देता है रंगों से भाग्य बदलता होता तो पृथ्वी पर प्रकृति द्वारा सभी रंग बने है इसलिए किसी का भाग्य उसकी इच्छा से विपरीत नहीं होता |

भाग्य का संबंध कर्मफल से है, जो लोग कर्मफल से भयभीत होते है वह उपायों की शरण में जाते है | धर्म डरपोक बनाता है, जो व्यक्ति जितना अधिक धार्मिक है उसके मन में पाप-पुण्य और स्वर्ग-नरक को लेकर उतना ही अधिक भय होता है | श्री विजय बतरा जी का कहना है कि :

  • यदि पत्थरों को पहनने से भाग्य बदलता तो पहले उन खानों और पहाड़ों का भाग्य बदलता जहाँ पत्थर होते है !
  • यदि दिशाओं से व्यक्ति की दशा बदलती तो पृथ्वी पर रहने वाले किसी एक दिशा के लोग ही सुखी होते !
  • कुंडली में ग्रहों के घर देखने वालो को कर्म पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि ग्रह इतने छोटे नहीं है कि उनके घर हो !

आध्यात्म की व्याख्या श्री बतरा जी इस प्रकार करते है कि व्यक्ति का धार्मिक स्तर उसका आध्यात्मिक स्तर नहीं है, दोनों में विशाल भिन्नता है | आध्यात्म का अर्थ है कि जब निर्भरता, आवश्यकता, विवशता, इच्छा, भय, भ्रम, कर्म, कर्मफल इत्यादि सभी कुछ शून्य हो | जब मन पर किसी व्यक्ति या बाहरी वस्तु का प्रभाव नहीं हो, आध्यात्म, धर्म नहीं है और धर्म आध्यात्म नहीं है | आध्यात्म का संबंध आत्मा से है और यह निराकार है जबकि धर्म का संबंध शरीर और साकार संसार से है |

उपायों का नकारात्मक प्रभाव !

ऐसे भी कई सज्जन और देवियाँ है जो ज्योतिष, रेकी इत्यादि विज्ञानों की सहायता से लोगो की समस्याओं के लिए उपाय बताते है और कुछ ऐसे भी हैं जो गद्दी लगा कर लोगों की समस्याओं का समाधान उपाय बताकर या स्वयं करते है |

पिछले कई सालों के अनुभव और निजी शोध द्वारा श्री बत्रा जी  इस निष्कर्ष पर पहुंचें हैं कि गुरु यानी मार्गदर्शक का कार्य करने वाले लोगों को उपाय बताने के बदले गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है | इनमे मुख्य समस्या उनका स्वास्थ्य या पारिवारिक सुख की कमी है | इसका मुख्य कारण यह है कि मार्गदर्शक के पास आने वाले व्यक्ति को बताये गए उपाय के साथ-साथ मार्गदर्शक स्वयं कोई उपाय नहीं करता | मार्गदर्शक व्यक्ति जिस भी ग्रह या देव का उपाय बताता है वह स्वयं उस ग्रह या देव के लिए कोई उपाय नहीं करता, कभी कभी तो मार्गदर्शक जिस ग्रह या देव के उपाय बताता है उनमे उसकी स्वयं की आस्था ही नहीं होती |

गुरु / मार्गदर्शक उपाय बताकर बाधा समाप्त करने का यत्न करता है और यह समझता है कि ऐसा करना मेरा व्यवसाय है जिसके बदले मैंने धनराशी ले ली है और जातक की समस्या दूर होने पर मुझे अतिरिक्त लाभ पुण्यकर्म के रूप में भी मिलेगा | यदि ऐसा होता तो उपाय बताने या किसी बाधा पर कार्य करने वालों को तो कभी कोई समस्या ही नहीं होती क्योंकि उनके पुण्यकर्म तो दिन प्रतिदिन बढ़ रहे है | हम सभी जानते है कि संसार कर्मों के लेनदेन से चलता है जब तक लेनदेन समाप्त नहीं होता तब तक आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती | मार्गदर्शक जिस भी ग्रह या देव का उपाय बताता है वह ग्रह या देव उस ग्रसित व्यक्ति को तभी छोड़ेंगे जब उनका हिसाब मार्गदर्शक स्वयं दे |

ऐसा भी कहा जाता है कि ग्रह या देव पूजा अर्चना से प्रसन्न होते है साथ ही यह भी कहा जाता है कि स्वार्थ में की गयी पूजा अर्चना का कोई लाभ नहीं होता, ऐसी पूजा अर्चना करने से तो नहीं करना अच्छा है | ग्रह या देव मार्गदर्शक के संबंधी नहीं हैं ना ही उसके सेवक है कि उसके बताये उपाय को करने से व्यक्ति की बाधा/समस्या भी दूर हो जाये और कर्मफल समाप्त भी हो जाये |

कर्मफल को समाप्त करने के लिए समस्या ग्रसित व्यक्ति के साथ साथ मार्गदर्शक अपनी ऊर्जा को कर्मफल समाप्त करने में लगाये तो ही वह उपायों के नकारात्मक प्रभाव से बच सकता है, अधिकतर मार्गदर्शक ऐसा नहीं करते | यहाँ तक कि एक बड़ी संख्या को तो यह भी नहीं मानती क्योंकि उन्हें इस बात का ज्ञान ही नहीं है कि उन पर उपाय बताने से कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ता है जबकि किसी का कार्य पूरा होने पर पुण्यकर्म पर अधिकार समझते है | यदि किसी का सही मार्गदर्शन करने से सकारात्मक प्रभाव है तो कर्मफल मिलने में बाधा बनने पर नकारात्मक प्रभाव भी है |

यदि किसी का सही मार्गदर्शन करने से सकारात्मक प्रभाव है तो कर्मफल मिलने में बाधा बनने पर नकारात्मक प्रभाव भी है | आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो हर कर्म का एक फल होता है और वह फल तब तक समाप्त नहीं होता जब तक उसको पूरा भोगा नहीं जाये | जब कोई व्यक्ति मार्गदर्शक द्वारा बताई गयी विधि, उपाय, दान, पूजा इत्यादि को श्रद्धा से करता है तो उसकी बाधा/समस्या का प्रभाव मार्गदर्शक पर पड़ता है, क्योंकि मार्गदर्शक ने उस व्यक्ति और बाधा की मध्यस्था की है इसलिए उसे भी बाधा का एक भाग अवश्य भोगना पडता है | व्यक्ति का बिना भोगा कर्मफल मार्गदर्शक के हिस्से में आता है जिसके प्रभाव से मार्गदर्शक के जीवन में ऐसी समस्याएं भी आती है जो उसके भाग्य की नहीं होती हालाँकि दूसरे के कर्मफल को भोगने से पुण्यकर्म भी बनता है परन्तु सकारात्मक प्रभाव शीघ्र खर्च होता है | प्रत्येक मार्गदर्शक को स्वयं का इतना ज्ञान तो होता ही है कि वह कितने पानी में है और वह स्वयं कितनी कर्मपूँजी कमाता और खर्च करता है |

गुरु / मार्गदर्शक जो भी उपाय बताता है उस उपाय का एक भाग उसे स्वयं भी करना चाहिए क्योंकि कर्मफल को भोग कर समाप्त करने की जवाबदेही मार्गदर्शक की होती है | यदि वह ऐसा नहीं करता तो इस जन्म या अगले किसी जन्म में दूसरों के भाग्य के कर्मफल उसके साथ साथ चलते है | ऐसे अनेकों व्यक्तियों से मेरी बात होती है जिनका यह कहना होता है है कि उन्होंने अपने जीवन काल में किसी का मन नहीं दुखाया और ना ही ऐसा कोई कर्म किया है जिसका उन्हें ऐसा दंड मिले | पुराने समय में एक गुरु होता था, जिसका कोई स्वार्थ नहीं होता था, जिसकी अपनी कर्मपूंजी इतनी होती थी कि अनेकों गावों का भला करने और कर्मफल को समाप्त करने की शक्ति होती थी | वर्तमान काल के कहे जाने वाले गुरु ना ही कर्मपूंजी पर ध्यान देते है ना ही शक्ति जागृत करने पर ध्यान देते है | श्री बतरा जी का ध्येय किसी की निंदा करना नहीं है, केवल सही मार्गदर्शन करना है | 

 

यंत्रों से निकलती है नकारात्मक ऊर्जा !

यंत्र का उपयोग किसी विशेष कार्य को पूर्ण होने या इच्छा की सिद्धि के लिए किया जाता है | सभी प्रकार के यंत्रों पर इच्छित कार्य के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के आकार बने होते है जिनकी अपनी ऊर्जा शक्ति होती है |

यंत्रों पर भिन्न-भिन्न अक्षर या अक्षरों से शब्द अथवा वाक्य/मंत्र होते है, सभी अक्षरों का अपना-अपना वास्तविक ध्वनी कम्पन होता है | ध्वनी कम्पन से विशेष तरंगें निकलती है जो किसी इच्छा सिद्धि के लिए बहुत अधिक सहायक होती है |

यंत्रों में धातु और रंगों का भी प्रयोग होता है, प्रत्येक धातु का अपना बल प्रभाव होता है इसी प्रकार सभी रंगों का भी अपना सांसारिक महत्त्व है | किसी यंत्र के निर्माण के लिए आकर, रेखाचित्र, अक्षर, धातु और रंग आवश्यक होते है |

बिंदु, रेखा, त्रिकोण, चतुर्भुज, पंचभुज, षष्टकोण, सप्तकोण, अष्टकोण, घेरा इत्यादि का आपस में समानता नहीं है इसलिए इनका प्रभाव भी सामान नहीं है | इसी प्रकार सभी अक्षरों का ध्वनी कम्पन भी एक दूसरे से भिन्न है |

यंत्रों का अधिकतम प्रयोग धन के लिए, बीमारी से छुटकारा पाने के लिए, अकारण परेशानियों से मुक्ति के लिए और भूत प्रेत व नकारात्मकता से बचने के लिए किया जाता है | कुछ लोग यंत्रों को गले या अंगूठी में भी धारण कर लेते है |

सकारात्मक फल की इच्छा से रखे गए यंत्र का नकारात्मक प्रभाव भी होता है क्योंकि प्रकृति का नियम है कि संसार की सभी वस्तुओं का प्रभाव सकारात्मक और नकारात्मक दोनो ही प्रकार का होता है | यह अलग बात है कि व्यक्ति केवल लाभ को ही देखता है |

एक कार्य के लिए दो भिन्न – भिन्न प्रकार के यंत्रों को रखने से उनकी ऊर्जा शक्ति,  ध्वनी कम्पन और बल आपस में टकराने के कारण नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है जिससे कार्यों में सफलता नहीं मिलती बल्कि रुकावट होती है |

एक स्थान पर अनेकों यंत्रों की ऊर्जा शक्ति के प्रभाव से व्यक्ति के निजी सुखों पर नकारात्मक पड़ता है | अनेकों प्रकार की ऊर्जाओं से उत्पन्न नकारात्मकता भूत-प्रेत इत्यादि दुष्ट शक्तियों का प्रभाव भी अधिक करती है | श्री बतरा जी यंत्रों के नकारात्मक प्रभाव को बताने वाले विश्वभर में एकमात्र व्यक्ति हैं | 

यंत्र का लाभ तभी है जब उससे सम्बंधित उचित अक्षर अथवा शब्द का उच्चारण किया जाए | यंत्र और शब्द का आपस में मेल नहीं होने से भी यंत्रों से नकारात्मक ऊर्जा निकलती है |

 

कर्मकांड कितने सही है ?

ऐसा माना जाता है कि आत्मा कर्मों के आधार पर मनुष्य के अतिरिक्त ८४ लाख प्रकार के शरीर धारण करती है । मनुष्य की मृत्यु के पश्चात उसके मोक्ष के लिए अनेको कर्मकांड, धर्म क्रियाएं, अनुष्ठान, संस्कार समारोह इत्यादि किये जाते है । विचार करने वाली यह बात है कि यह सब करने से आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है या यह सब रस्में दिखावे और लाभ के लिए बनायीं गयी है ?  मनुष्य के अतिरिक्त किसी अन्य जीव जंतु की कोई धर्म क्रिया, अनुष्ठान इत्यादि नहीं होते तो क्या उन आत्माओं को मोक्ष नहीं मिलता ? मनुष्य मृत्यु के बाद मोक्ष के लिए किये गए अनेकों प्रयास के बाद भी प्रेतात्माएं  मनुष्य की आत्मा ही बनती है किसी और जीव जंतु की नहीं । अनेको लोगो को प्रेतआत्माओं का आभास होता है जिनमे से लगभग सभी लोगो को मनुष्य वाली आकृति ही दिखती या अनुभव होती है । जो आत्मा मनुष्य शरीर धारण करती है मृत्यु पश्चात अनेकों कर्मकांडों के बाद भी उसकी आत्मा अगले शरीर (जन्म) के लिए भटकती है । जीव जंतुओं की मृत्यु के बाद कोई कर्म काण्ड ना होने पर भी उन्हें अगला शरीर मिल जाता है ।

एक बात और विचार करने योग्य है कि यदि मृत्यु के पश्चात आत्मा ने दूसरे शरीर को धारण कर लिया है तो उसके लिए खिलाया खाना उसको कैसे पहुंचेगा ?

यदि कर्मकांडों से आत्मा का मोक्ष हो गया है तो खाना खिलाने वाला कर्म तो निष्फल ही जायेगा । हर साल मृतकों के नाम का खाना खिलाना या दान देना किसी निजी लाभ के लिए बनाये भय या भ्रम का हिस्सा हो सकता है । इस भय के कारण मृतक संबंधियों के लिए पकवान खिलाये जाते है चाहे उनके जीवन काल में उन्हें पानी भी ना पूछा गया हो । इसका यह भी अर्थ हो सकता है कि यह सब कर्मकांड प्रेतात्माओं का भय बताकर निजी लाभ के लालच से कराये जाते है । यदि आत्मा को अपने कर्मों के अनुसार ही नया शरीर (जन्म और मृत्यु) मिलते है तो भय या भ्रम में किये कर्मकांडों का क्या लाभ है ? यदि कर्मकांडों से मोक्ष मिल जाता तो अच्छे कर्म करने की क्या आवश्यकता होती क्योंकि मृत्यु के बाद हमारी प्रेतात्मा के डर से संबंधी ही सारे कर्मकांड कर देते और मोक्ष हो जाता ।

श्री बतरा जी की किसी से निजी ईर्ष्या नहीं है उनका केवल इतना कहना है कि अपना समय, धन और शक्ति का प्रयोग किसी कर्म के तर्क को समझने के पश्चात ही करना चाहिए ।

 

आप कैसा मोक्ष चाहते है ?

संसार के लगभग सभी धर्मों में मोक्ष को बहुत महत्त्व दिया जाता है, ऐसी धारणा है कि आत्मा को मोक्ष मिलने से बढकर संसार में कुछ भी नहीं है | यह भी कहा जाता है कि मनुष्य के जन्म का एक ही लक्ष्य, केवल मोक्ष को पाना है | मोक्ष का अर्थ यह माना जाता है कि मृत्यु के बाद आत्मा जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर बैकुंठ /स्वर्ग में वास करती है और फिर से पृथ्वी पर नही आती | हर व्यक्ति भी यह चाहता है कि उसे मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति हो जिससे उसे जन्म-मृत्यु के चक्र से छुटकारा मिले जिसके लिए वह जीवन भर अनेकों प्रयत्न / कर्म भी करता रहता है | व्यक्ति अपने अतिरिक्त जितनी भी योनियाँ (जीव जंतु, पशु पक्षी, कीट पतंगे इत्यादि) देखता है वह उनके जैसा नहीं बनना चाहता इसलिए भी मोक्ष की इच्छा करता है | इसे ऐसा भी कह सकते है कि मोक्ष की इच्छा के पीछे चौरासी लाख योनियों का भय भी होता है |

विचारणीय बात तो यह है कि क्या मोक्ष की इच्छा मनुष्य शरीर के अतिरिक्त अन्य योनियों वाले जीवों से घृणा करना सिखाती है ?

कुछ लोगों ने अपने निजी लाभ के लिए ऐसी अनेकों बातें फैलाई है जिनकी सहायता से वह दूसरों को मूर्ख बनाने का कार्य करते है | इनमे कुछ मुख्य बातें इस प्रकार है :

  • इच्छा करना छोड़ दो - जब व्यक्ति में कोई भी इच्छा नहीं होगी तो मोक्ष की भी नहीं होगी और संसार में कोई व्यक्ति धर्म को भी क्यों मानेगा ? यदि इच्छा की संसार में आवश्यकता नहीं होती तो यह जीव में होती ही क्यों ?
  • निष्काम कर्म करो क्योंकि स्वार्थ में किया गया धर्म-कर्म निष्फल जाता है - यदि मोक्ष की इच्छा में किया गया धर्म-कर्म स्वार्थ है तो फिर किसी भी व्यक्ति का भी मोक्ष नहीं होता, मोक्ष शब्द केवल शिश्य बनाने का सुगम साधन है |
  • मोक्ष केवल धर्म के रास्ते पर चल कर ही मिलता है और यह भी कहा जाता है कि स्वर्ग और नरक इसी धरती पर हैं, यदि स्वर्ग यहीं है तो फिर मोक्ष के बाद आत्मा किस स्वर्ग/बैकुंठ में जाती है या फिर भ्रमित करने के लिए मोक्ष के स्वर्ग का स्वप्न दिखाया जाता है यह भी एक गंभीर प्रश्न है |

सही ज्ञान नहीं होने के कारण साधारण व्यक्ति ऐसे प्रश्नों को अनदेखा करता है क्योंकि इस प्रकार के उपदेश देने वाले व्यक्ति को भी इस बात की सत्यता का ज्ञान नहीं है |  हर गुरु (उपदेश करने वाले व्यक्ति) के अनुसार उसे जैसा ज्ञान है केवल उसी से ही मोक्ष मिलता है क्योंकि उसे भी उसके गुरु ने उतना ही बताया गया है |

उपदेश ऐसा व्यक्ति देता है जिसे ईश्वर, आत्मा, कर्म और कर्मफल का ज्ञान हो परन्तु अधिकतर उपदेश देने वाले व्यक्ति को मोक्ष मिलेगा या नहीं यह भी निश्चित नहीं है, जिसके स्वयं के मोक्ष का पता नहीं है वह दूसरों को मोक्ष का मार्ग दिखाता है या भ्रमित करके केवल आजीविका कमाता है यह भी अपनेआप में एक विचारणीय बात है |  

प्राय: यह भी कहते है काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार, ये सभी ऐसे विकार है जिनके कारण मोक्ष होना असंभव है | यदि यह विकार मनुष्य में हैं तो मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती, इसी बात में अधिकतर लोग विश्वास भी करते है | काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार मन का स्वभाव है जिनका आत्मा से कोई लेना देना नहीं है क्योंकि उपदेशक व्यक्ति ही यह भी कहता है कि आत्मा में ईश्वर वास करते है या आत्मा, ईश्वर का अंश है; आत्मा अति शुद्ध है,  इसलिए आत्मा में कोई विकार होने का प्रश्न ही नहीं है | यह सब तथाकथित विकार (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) केवल मस्तिष्क में होते है, जीव(आत्मा) में विकार कैसे हो सकते है जहाँ ईश्वर वास है | मनुष्य का स्वभाव अति नम्र होना चाहिए जिससे संसार में शांति बनी रहे परन्तु मनुष्य के स्वभाव को विकार बताकर भ्रमित करना उचित नहीं है ?

यदि एक पल के लिए यह भी मान लें कि मोक्ष ऐसे ही प्राप्त होता है जैसा हमें उपदेशक बताते है | बीते करोड़ों वर्षों में अनेकों देवी-देवता ऋषि-मुनि, गुरु-संत, साधक-भक्त हुए है जिन्होंने जीव कल्याण के लिए अपना सारा जीवन लगाया, कुछेक ने नए धर्म या पंथ का निर्माण भी किया, इन सभीआदरणीय दिव्य आत्माओं का मोक्ष भी अवश्य हुआ है क्योंकि इनके द्वारा बताई गयी बाते संसार में आज तक मानी जाती है |

अब एक प्रश्न है कि यदि सभी आदरणीय दिव्य आत्माएं स्वर्ग / बैकुंठ में है तो प्रार्थना करने पर भी वे किसी व्यक्ति का कार्य करने क्यों आएंगे क्योंकि व्यक्ति तो स्वयं के कर्मों को भोग रहा है | जो आदरणीय आत्माएं स्वयं के कर्मफल से नहीं बची थी वह किसी व्यक्ति को क्यों बचाएंगी, क्योंकि मोक्ष होने के बाद सांसारिक जीवों और वस्तुओं से मोह-ममता नहीं रहती |  

क्या मोक्ष का अर्थ किसी की सहायता करना या किसी का कार्य करना है ?

यदि मोक्ष के बाद भी कोई कार्य (कर्म) करना है तो मोक्ष की क्या आवश्यकता है कर्म तो किसी भी योनी में होता रहता है | संसार में बिना शरीर के विचर रही आत्माओं को प्रेतात्मा कहते है, आदरणीय दिव्य आत्माएं किसी की दास नहीं है कि कोई भी बुलाएगा और वह उसकी हाजरी में पहुँच जाएँगी |

एक और बहुत ही हास्यास्पद बात यह भी कही जाती है कि मनुष्य योनी को देवी-देवता भी तरसते है |

  • क्या ऐसा संभव है कि कोई आदरणीय दिव्य आत्मा स्वर्ग/बैकुंठ में वास करते हुए भी किसी सांसारिक(नाशवान) वस्तु के लिए तरसती हो ? 
  • स्वर्ग में वह आत्मा पहुचती है जो आत्मा तृप्त/संतुष्ट है, यदि उस आत्मा सांसरिक इच्छा है और उसे तृप्ति/संतुष्टि ही नहीं है तो वह स्वर्ग कैसे पहुँच गयी ?

वास्तव में भय, भ्रम और बिना तर्क/तथ्य वाली बातों का बहुत अधिक फैलना मनुष्य के लिए अति घातक है | मनुष्य को तर्क और तथ्य पर आधारित आध्यात्मिक शिक्षा/ज्ञान पर ही विश्वास करना चाहिए  |

शून्यपंथ किसी भी तर्कहीन और भ्रमित करने वाली बात का समर्थन नही करता है क्योंकि यह किसी भी सांसारिक वस्तु, जीवित या मृत व्यक्ति, चित्र, आकृति, दिशा, कर्मकांड, यंत्र, मंत्र, तंत्र, नाम, वेशभूषा, इत्यादि पर निर्भर नही है ।

अज्ञानता की समाप्ति – महामोक्ष की प्राप्ति

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श्री Vijay Batra जी के बारे में :

श्री विजय बतरा कर्मज्ञाता और आध्यात्मज्ञाता होने के साथ-साथ आध्यात्मिक लेखक और आध्यात्मिक शिक्षक भी है | श्री बतरा जी अनेकों वर्षों से आध्यात्म के प्रचार और अंधविश्वास की समाप्ति के उद्देश्य से इन्टरनेट और व्यक्तिगत रूप से मिलकर भारत और विदेशों में हजारों समस्याग्रसित और आध्यात्मिक ज्ञान की खोज करने वाले लोगों का मार्गदर्शन कर चुके है | इनके आध्यात्मिक विचार, लेख, पुस्तकें व्यक्ति को भय एवं भ्रम से मुक्त करके सकारात्मक जीवन जीने की कला सिखाती है | इनका जीवन आध्यात्म को समर्पित है इसी कारण इन्होने उन प्रश्नों के तार्किक उत्तर लिखे है जिन प्रश्नों का उत्तर अभी तक रहस्य ही बने हुए थे |  धर्म द्वारा फ़ैल रहे भ्रम और भय को समाप्त करने के लिए श्री बतरा जी ने शून्यपंथ की भी स्थापना की है जो विश्व का एकमात्र पंथ है जिसमे केवल शून्य/ईश्वर और आध्यात्म का प्रचार है इसके अतिरिक्त किसी धर्म, व्यक्ति, ग्रंथ इत्यादि का प्रचार नहीं है | श्री बतरा जी नकारात्मक ऊर्जा से ग्रसित लोगों को अपने विशेष परामर्श और आध्यात्मिक उपचार से मानसिक आरोग्यता प्रदान कर रहे है, आप भी इसका लाभ उठा सकते है |

Vijay Batra : Karmalogist

Founder of  शून्यपंथ
Author of  
शून्यसंहिता : विश्व की एकमात्र आध्यात्मिक संहिता !